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जल है तो कल है: 27वें दिन हरियाणा में गूंजा ‘यमुना बचाओ’ संकल्प, बल्लबगढ़ में ऐतिहासिक स्वागत

बल्लबगढ़, 24 फरवरी। अविरल और निर्मल यमुना के संकल्प के साथ निकली जल सहेलियों की ऐतिहासिक यात्रा का 27वां दिन हरियाणा की धरती पर ऊर्जा और उत्साह के साथ संपन्न हुआ। यात्रा की शुरुआत बल्लबगढ़ स्थित बालाजी कॉलेज बल्लबगढ़ से हुई, जहां निदेशक डॉ. जगदीश चौधरी की अध्यक्षता में “जल संवाद: यमुना विशेष” कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. प्रवीण झा, तरुण भारत संघ की उपाध्यक्ष इंदिरा खुराना और जल सहेली समिति के संयोजक संजय सिंह ने यमुना की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों और संभावित समाधानों पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस दौरान जल सहेलियों ने प्रेरणादायक जल गीत प्रस्तुत किए और बड़ी संख्या में पर्यावरण कार्यकर्ता भी शामिल हुए।

बाजार में भव्य स्वागत, गूंजे जागरूकता के नारे

जैसे ही यात्रा बल्लबगढ़ बाजार पहुंची, स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और विद्यार्थियों ने पुष्पवर्षा कर भव्य स्वागत किया। “यमुना बचाओ”, “जल है तो कल है” और “नदियां रहेंगी तो सभ्यता बचेगी” जैसे नारों से पूरा इलाका गूंज उठा।

यह यात्रा विशेष इसलिए भी है क्योंकि बुंदेलखंड की महिलाओं द्वारा नदियों के संरक्षण के लिए संगठित रूप में निकाली जा रही यह अपने प्रकार की पहली पहल मानी जा रही है। जो महिलाएं कभी घर की चौखट से बाहर निकलने में संकोच करती थीं, वे आज प्रकृति संरक्षण की अगुवाई कर रही हैं।

जागरूकता और संवाद पर जोर

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. संजय सिंह ने कहा कि यह यात्रा किसी के विरोध के लिए नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता और सामूहिक भागीदारी के उद्देश्य से निकाली गई है। उन्होंने बताया कि छात्रों के साथ यमुना विषय पर संवाद अत्यंत सकारात्मक रहा और युवाओं में नदी संरक्षण को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी है।

उन्होंने जानकारी दी कि यात्रा का समापन 26 फरवरी को दिल्ली के वासुदेव घाट पर होगा। विभिन्न माध्यमों में इसे महिला-नेतृत्व वाली पहली ऐतिहासिक यमुना संरक्षण यात्रा बताया गया है।

प्रकृति से जुड़ने का आह्वान

डॉ. जगदीश चौधरी ने कहा कि आधुनिक विकास की दौड़ में समाज ने प्रकृति से दूरी बना ली है। पहले तालाब, कुएं और बावड़ियां स्वच्छ जल के स्रोत थे, लेकिन अंधाधुंध विकास ने इन्हें समाप्त कर दिया। आज कई क्षेत्रों में जल संकट गहराता जा रहा है और ऐसे में जल सहेलियों का यह प्रयास समाज की चेतना को जगाने वाला है।

जल सहेली समिति की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि यमुना केवल नदी नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और आस्था की जीवनरेखा है। श्रीकृष्ण की लीलाओं से लेकर उत्तर भारत की सांस्कृतिक विरासत तक यमुना का विशेष स्थान है। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद जल सहेलियां इस अभियान को निरंतर आगे बढ़ा रही हैं।

जल सहेली लक्ष्मी ने कहा कि यदि आज जल स्रोतों को नहीं बचाया गया तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। वहीं समिति की उपाध्यक्ष रेखा ने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ी तो जल सत्याग्रह का रास्ता भी अपनाया जाएगा।

वरिष्ठ समाजसेवी इंदिरा खुराना ने इस पहल को नारी शक्ति और सामाजिक परिवर्तन का सशक्त उदाहरण बताया।

यात्रा जाट भवन सेक्टर-3 से किसान भवन सेक्टर-16 होते हुए रात्रि विश्राम के लिए आइडियल पब्लिक स्कूल लकड़पुर पहुंची, जहां अगले चरण की तैयारियां की गईं।

यह अभियान न केवल यमुना संरक्षण का संदेश दे रहा है, बल्कि समाज को जल और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी याद दिलाने का भी प्रयास कर रहा है।

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