भारत वापसी पर अनिश्चितता: विजय माल्या ने बॉम्बे हाई कोर्ट में जताई कानूनी मजबूरी

भगोड़े कारोबारी विजय माल्या ने बुधवार को बॉम्बे हाई कोर्ट को बताया कि वह फिलहाल यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि वह कब भारत लौट पाएंगे। उन्होंने यूनाइटेड किंगडम में चल रही कानूनी कार्रवाइयों से उत्पन्न बाधाओं का हवाला दिया।
अपने वकील के माध्यम से उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि यूनाइटेड किंगडम की अदालतों द्वारा जारी आदेश उन्हें इंग्लैंड और वेल्स छोड़ने, विदेश यात्रा की कोशिश करने, अंतरराष्ट्रीय यात्रा दस्तावेज़ के लिए आवेदन करने या उसे रखने से भी रोकते हैं। इन प्रतिबंधों के कारण वह भारत वापसी की कोई निश्चित समयसीमा बताने में असमर्थ हैं।
माल्या की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित देसाई ने अदालत से आग्रह किया कि उनकी दोनों याचिकाओं पर अलग-अलग सुनवाई की जाए, भले ही उनका मुवक्किल शारीरिक रूप से भारत में उपस्थित न हो सके। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कई मामलों में याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति के बावजूद संवैधानिक अदालतों ने रिट याचिकाओं पर निर्णय दिए हैं।
यह घटनाक्रम अदालत के उस सख्त रुख के कुछ दिन बाद सामने आया है, जिसमें उसने कहा था कि वह फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट के प्रावधानों को चुनौती देने वाली माल्या की अर्जी पर तब तक सुनवाई नहीं करेगा, जब तक वह स्वयं वापस आकर उसके अधिकार क्षेत्र में उपस्थित नहीं होते। अदालत ने यह भी स्पष्ट करने को कहा था कि यदि वह राहत चाहते हैं तो क्या उनकी भारत लौटने की मंशा है।
माल्या के वकील ने दलील दी कि इंग्लैंड की अदालतों के आदेश उनके देश छोड़ने की क्षमता पर रोक लगाते हैं, जिसके चलते वह भारत यात्रा की कोई समयसीमा तय नहीं कर पा रहे।
हालांकि, पीठ ने इस रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल इंग्लैंड की अदालतों के आदेशों का हवाला देना पर्याप्त नहीं है, जब तक यह स्पष्ट न हो कि उन आदेशों को चुनौती दी गई है या यात्रा की अनुमति मांगी गई है।
पीठ ने देसाई को निर्देश दिया कि एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया जाए, जिसमें यूके की अदालतों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों की प्रकृति, उन्हें चुनौती देने की स्थिति और भारत वापसी पर माल्या का स्पष्ट रुख दर्ज हो। अदालत ने हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च तक के लिए स्थगित कर दी।
अदालत ने दोहराया कि भगोड़ा घोषित कोई भी व्यक्ति भारतीय कानून के दायरे से बाहर रहकर अदालत से राहत की मांग नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अपने खिलाफ चल रही कार्रवाई को चुनौती देते हुए माल्या न्यायिक प्रक्रिया से बच नहीं सकते।
इसी के मद्देनज़र, पीठ ने 2018 के कानून के खिलाफ उनकी याचिका पर सुनवाई के लिए उनकी शारीरिक वापसी या कम से कम ऐसा करने के स्पष्ट आश्वासन को अनिवार्य शर्त माना है।
बॉम्बे हाई कोर्ट में दायर मौजूदा याचिका में फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर्स एक्ट के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता और उन्हें भगोड़ा घोषित किए जाने की कार्रवाई को चुनौती दी गई है।
