डैमेज कंट्रोल में जुटे डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक, आवास पर 101 बटुकों का सम्मान कर दिया बड़ा राजनीतिक संदेश
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों ब्राह्मण राजनीति को लेकर हलचल तेज है। इसी कड़ी में राज्य के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने गुरुवार को लखनऊ स्थित अपने सरकारी आवास पर 101 बटुकों का सम्मान कर बड़ा राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की। इसे विपक्षी दलों—खासतौर पर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी—द्वारा ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिशों के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।
प्रतीकात्मक राजनीति को मिला बल
प्रदेश में इन दिनों प्रतीकात्मक आयोजनों के जरिए सामाजिक समीकरण साधने की राजनीति तेज हो गई है। हाल ही में प्रयागराज के माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़े शिष्यों की शिखा खींचे जाने के विवाद ने तूल पकड़ा था। इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए ब्रजेश पाठक ने संबंधित पुलिसकर्मियों को ‘पापी’ तक कह दिया था।
इसी पृष्ठभूमि में उनके आवास पर आयोजित बटुक पूजन और सम्मान समारोह को राजनीतिक संदेश से जोड़कर देखा जा रहा है।
आवास पर हुआ सम्मान समारोह
लखनऊ के राजभवन कॉलोनी स्थित सरकारी आवास पर आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में बटुक पहुंचे। उपमुख्यमंत्री ने पत्नी के साथ मिलकर उनका पूजन किया, तिलक लगाया और पुष्पवर्षा कर सम्मानित किया। कार्यक्रम का माहौल उत्सव जैसा रहा और इसे ब्राह्मण समाज के सम्मान से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।
‘शिखा खींचने वालों को लगेगा पाप’
17 फरवरी को लखनऊ में एक मीडिया कार्यक्रम के दौरान ब्रजेश पाठक ने कहा था कि बाल ब्राह्मणों की शिखा खींचने वालों को “महापाप” लगेगा और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। उनके इस बयान ने राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी थी—खासतौर पर इसलिए क्योंकि वे स्वयं सरकार में उपमुख्यमंत्री पद पर हैं।
सीएम के बयान से बढ़ा सियासी तापमान
इस पूरे विवाद के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान भी चर्चा में रहा। बजट सत्र के दौरान उन्होंने बिना नाम लिए कहा था कि “कोई स्वयं को शंकराचार्य कैसे कह सकता है, कोई भी कानून से ऊपर नहीं—मैं भी नहीं।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ दल के भीतर भी अलग-अलग राय देखने को मिली।
विपक्ष भी सक्रिय
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। वहीं बसपा प्रमुख मायावती भी लगातार ब्राह्मण समाज के पक्ष में बयान देती रही हैं।
ब्राह्मण विधायकों की बैठकों और जातीय समीकरणों को लेकर चल रही सियासी खींचतान ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है।
डैमेज कंट्रोल या राजनीतिक विस्तार?
राजनीतिक पंडित ब्रजेश पाठक के इस आयोजन को दो नजरियों से देख रहे हैं—
- एक, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद से उपजे असंतोष को शांत करने की कोशिश
- दूसरा, स्वयं को प्रदेश की ब्राह्मण राजनीति के प्रमुख चेहरे के रूप में स्थापित करने की रणनीति
फिलहाल, इस कार्यक्रम के बाद प्रदेश की राजनीति में संदेश साफ गया है कि ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सियासी सक्रियता आने वाले समय में और तेज रहने वाली है।
